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गाँव की छोरी शहर का लड़का | एक प्रेम कहानी

गाँव की छोरी शहर का लड़का | एक प्रेम कहानी | Hindi Love Story

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विजय मल्होत्रा, बिज़नेस तिकूं, शहर के चाँद रहीसों में से एक। रुपाया, पैस, गाङी, नौकर किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। बस एक कमी थी उनका बेटा अजय जो शरीर से तो २० साल का हटा कट्टा आदमी बन गया था लेकिन एक एक्सीडेंट की वजह से उसके दिमाग पर चोट लगी जिससे उसका दिमाग एक बच्चे की तरह काम कर रहा था।

देखने में औरों की तरह बड़ा ही था लेकिन हरकतें ऐसी जैसे कोई छोटा सा मासूम सा बच्चे है। घरवालों को तो उसकी बल-सुलभ अदाओं पर प्यार आता था लेकिन बाहर वो ऐसी हरकत करेगा तो दुनिया उसे पागल समझेगी। बस यही चिंता विजय को खाये जा रही थी। ऊपर से इतना बड़ा बुसिनेस्। अगर अजय ठीक नहीं हुआ तो इसे कौन सम्भालेंगा।

विजय ने अजय को बड़े से बड़े डॉक्टर्स से दिखवाया। लोंडो, अमेरिका तक में ुस्काईलाज चला लेकिन कहीं कोई फायदा नहीं हुये। विजय को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की थी की उसके बाद इतना बड़ा बिज़नेस अजय कैसे सम्भालेंगा। और यही चिंता उसकी गिरती सहत का कारण बनती जा रही थी जो आगे चलकर उसके बिज़नेस को खत्म कर सकती थी। उसने लाखों रुपये इलाज पर खर्च कर दिए लेकिन रिजल्ट वहीं का वाहि। अजय को न ठीक होना था और न हुआ।

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विजय अपने बिज़नेस के चलते उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पता था तो उसकी पत्नी यानी अजय की माँ भी अपनी किटी पार्टीज में बिजी थ। अजय अब तक सिर्फ नौकरो के सहारे ही बड़ा हुआ था। हाँ कभी कभी वो अपने दादि के पास गाँव चला जाता था जहाँ उसे बहुत अच्छा लगता था लेकिन वो भी २-४ सालों में एक बार।

विजय ने अपने फैमिली डॉक्टर विशाल से सलाह मश्विरा किया तो उसने बताया ?की फिलहाल तो कोई हल नजर नहीं आ रहा है तो एक काम कर सकते हैं अजय को कहीं दूर किसी हिल स्टेशन पर भेज देते है। वहाँ की हरियाळी, शुद्ध ताज़ी हवाए, मौसम ॉर्बरीश का मज, हो सकता है अजय के दमाग पर कुछ असर करे। क्या पता वो वही जाकर ठीक हो जाए। वहाँ तुम्हारी मम्मी भी हैं गाओं में। और वो एरिया हिल स्टेशन ही तो है। वहाँ क्यों नहीं भेज देता अजय को। उसकी देखभाल की भी चिंता खत्म और आंटी को भी थोड़े दिन पोते के साथ समय बिताने के लिए मिल जाएग।?

विजय ने कहा ? हाँ यार तूने अच्छा याद दिलाया। दो दिन बाद से अजय की स्कूल से दो महिनों की छुट्टी पड़ रही है। इन छुट्टियों में वो वहीँ घूम आएग। शायद उसकी किस्मत में वहां ही ठीक होना लिखा है। अब तो भगवन से यही प्राथना है की वो जल्दी से ठीक हो जाए। चलाये कोशिश भी करके देख लेते हैं वर्ण तो हर जगह से उम्मीद ही टूट चुकी है? और इतना कहते हुए विजय की आँखों में आंसू ा गै। विशाल ने किसी तरह उसे सम्भाला और समझा बुझाकर और कुछ दवाएं लिखकर अजय को समय से खिलने के लिए बोल दिया।

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विशाल ने उसे हौंसला दिया और तय्यारी करने को कह्। दो दिन बाद जब अजय के स्कूल की छुटियां स्टार्ट हो गयी तो विजय उसे उसकी दादी के पास छोड आया। अजय यहाँ आके बहुत खुश था। रोज सुबह सुबह खेतों में चला जाता। दिन भर खेतों में, पहाड़ों पर खेळत। चिड़ियों स, पेड़-पोधों से बातें करता, तितलियाँ पकडता बस दिन भर उसका मन वहीँ लगा रहता था। उसे यूँ खुश देखकर उसकी दादी भी बहुत खुश थी।

एक दिन अचानक जब वो खेल रहा था तभी उनके खेतों की रखवाली करने वाले माली की लड़की मीना अपनी सहेलियों के साथ खेतों के पास बने बागीचे में फूल तोड़ने आयी। उन्हें पता नहीं था कि आजाय वहां खेल रहा है। अजय ने अनजाने में उन्हें देख लिया। देख क्या लिया बल्कि यूं कहीये घूरने लगा।

आचनाक मीना की नजर उस पर पड़ी तो वो चिल्ला उठि। उसने अजय को देशी भाषा में गालियां निकालनी शुरू कर दी जिसे सुनकर अजय घबरा गया और वहां से तुरंत भाग गया। मीना का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। उसे अपनी सहेलियों से पता चल गया था की ये लड़का शहर से आया है और कहाँ ठहरा है तो वो सीधा वहीँ चली गयी।

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जब अजय ने उसे खिड़की से उसके घर की तरफ आते देखा तो डर के मारे वो अपने कमरे को अंदर से बंद करके बैठ गया। मीना ने सारी घटना जय की दादि को बतायी तो दादि ने उससे अपने पोते के किय की मांफी मांगी और अजय की हालत से अवगत कराया जिसे सुनकर मीना चौंक गायी। उसे अब अफ़सोस हो रहा था की उसने बेवजह ही उसे कितना डांट दिया था और यहां शिकायत भी करने चली आयी थी।

उसे लगा की उसे अजय से माफ़ी मांगनी चाहिए और उसकी दादि से परमिशन लेके अंदर चली गायी। वहाँ जाकर जब उसने दरवाजा खटखटाया तो अजय ने ड़र के मारे दरवाजा ही नहीं खोळ। उसने अजय को कहा ?अगर तुम दरवाजा नहीं खोलोगे तो में तुम्हारी दादि को सब बता दूंगी? बेचारा अजय क्या करता उसने धीरे से दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही मीना किसी प्यासी शेरनी की तरह अंदर लपकी और अजय को पीछे धकेलते हुए अंदर से दरवाजा बंद कर दिया।

आजय की तो हालत ख़राब थी। उसकी आँखें गीली हो गयी थी ये सोच कर की अब उसका क्या होगा। मीना को उसका मासूम चेहरा और उसकी भोली अदायें भा गयी और वो सोचने लगी की भगवन भी कितना निष्ठुर है जो इतने सुन्दर और जवान लड़के को दिमाग से कमजोर बना दिया।

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इसके बाद मीना ने पुछा ? तुम वहां रोज़ जाते हो? अजय ने बताया ? हाँ में रोज वाह जाता हूँ?। मीना ने कहा ? कल मेरे साथ चलना?। पहले तो अजय ने मना करने की सोचि लेकिन फिर उसे मीना द्वारा दादि को बात बता देने की धमकी याद आ गयी मरता क्या न करता मान गया। इतना बोल कर मीना वहां से चली गयी। अगले दिन मीना अजय के घर पहुँच गयी क्यूंकि वो जानती थी की अजय नहीं जाएग। लेकिन रास्ते भर मीना उससे हलकी फुलकी मजाक भरी बातें करती रही जिससे अजय का डर दूर भाग गया और तलाब तक पहुँचते पहुँचते अजय और मीना अच्छे दोस्त बन गए थे।

वाह पहुँच कर मीना और अजय ने ढेर सारी बातें की। अजय के साथ उसने भी कई तितलियाँ पकङी। वो लोग पकड़ते फिर उड़ा देते, फिर पकडते, फिर उड़ा देते काफी देर तक यही सब चलता रह। फिर वो दोनों खेतों के पास वाले बगीचे से तरह तरह के फूल तोड़ने लाग। अजय तो बच्चों जैसे पागल हो रहा था एक एक फूल को देख कर। कभी एक फूल को हाथ में लेकर सूँघता तो कभी दूसरे को। मीना को उसकी इन अदाओं पर प्यार ा रहा त।

दोनो कभी छोटी छोटी में आपस में लड़ पडते तो दूसरे ही पल ऐसे मिल जाते जैसे कितने गहरे दोस्त हो। एक दूसरे के दर्द और परेशानी को कितनी जल्दी समझ लेते थे। एक परेशां होता था तो दूसरा उसकी परेशानी अपने सर पर लेने के लिए हर समय तैयार रहता था।

कब तो ये उनका रोज़ का काम बन गया था। रोज़ बगीचे और खेतों में जाते और मनपसंद खेल खेलते। पहले तो दादि को उसका मीना के साथ रोज़ रोज़ जाना नागवार गुजरा लेकिन जब अजय की हालत में उन्हें सुधर दिखा तो उन्होंने सोचा की शायद मीना उसे ठीक करने की कोशिश कर रही है। क्यूँ न मीना को कोशिश करने दी जाए। शायद अजय ठीक हो जाए। फिर तो कोई रोक टोक नहीं। दोनों दिन में कम से कम एक बार तो जरूर मिलते थे और ढेर सारी बातें करते थे। धीरे धीरे अजय की हालत में सुधार आता गया।

इसका कारण सिर्फ बातें नहीं थी बल्कि वो प्यार, हमदर्दी, अपनापन था जो उसे अपने घर में कभी नहीं मिळा। पापा बिज़नेस में उलझे रहते थे तो मम्मी किटी पार्टीज में। ऐसा नहीं की वो अजय को प्यार नहीं करते थे लेकिन उनके पास अजय के लिए समय नहीं था। शायद यही कारण था अजय रिकवर नहीं कर प् रहा था। अब वो ही प्यार और अपनापन उसे मीना के रूप में दिखाई दे रहा था।

धीरे धीरे अजय पूरी तरह ठीक हो गया। उसकी दादी ने ये खुसखबरी अजय के पिता विजय मल्होत्रा को सुनाई जिसे सुनकर तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुये। वो बहुत खुश थे की उनकी ये कोशिश कितनी सफल हुई है। उन्होंने तुरंत गाँव जाकर अजय को वापस लेन की सोची। वो गाँव गए और अजय को वापस लेके चलने लगे। अजय गाडी में बैठ गया जाकर और रोज की तरह उस समय मीना वहां पर आयी जिसे अजय देख न सका।

मीना को देखकर अजय की दादी ने बताया? विजय बेटा आज अगर अजय ठीक हुआ है तो सिर्फ इस लड़की की वजह से। ईसकी कोशिश का ही नतीजा है की आज हमारा अजय बिल्कुक ठीक है। विजय ये सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने कुछ पैसे निकालकर मीना को देने चाहे और कहा ? बेटी तुमने हमारे बेटे के लिए कोशिश की ये उसका इनाम है रख लो।?

मीना को तो झटका सा लगा क्यूंकि वो अजय से प्यार करने लगी थी और यहां उसके प्यार का मजाक बन रहा था। उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया और कहा ? नहीं बाबूजी आप लोगों की सेवा करना तो हमारा कर्तव्य है। मुझे ये पैसे नहीं चहिये। विजय उसकी बातें सुनकर हैरान रह गया। और वो अपनी मा से विदा लेकर वहां से निकला और अपनी गाडी में बैठ गया और गाडी ने शहर के लिए चलना शुरू कर दिया। मीना भी वहां से चल दि। उसकी आँखें नम थी और बार बार एक ही सवाल उसके मन में उठ रहा था की ? ये मेरा प्यार था या सिर्फ कोशिश?

अजय वापस घर तो आ गया था लेकिन उसका मन नहीं लग रहा था। लगता भी कैसे पापा पैसा कमाने के चक्कर में ज्यादातर टूर पर रहते थे तो मम्मी को किटी पार्टीज से फुर्सत नहीं थी। पहले की बात और थी जब उसका दिमाग कमजोर था तो नौकरों के सँभालने पर संभल जाता था पर अब बात दूसरी थी। अकेलापन उसे काटने को दौड़ता था। कभी कभी वो रातों में इतना दर्जाया करता था की अक्सर चीख मार कर उठ जाता त। सारा बदन पसीने से तरबतर और दिमाग एक दम शुन्या।

रह रह कर उसे मीना की याद आती थी। वो उसकी जुल्फ़ों का बिखरन, उसका खिलखिलाकर हसन, उसका बेपनाह हुसन, उस्की मादक अंगाईयां, उसके रसीले होंठ सब जैसे अजय के दिमागमें एक तस्वीर की तरह बस गए थे। मीना ने उसके लिए क्या नहीं किया। रोज़ उसके सर पर बड़े प्यार से आयुर्वेदिक टेलोन की मालिश करती, उसके साथ समय बिताती, उससे मीठी मीठी बातें करती। मीना से उसे हर वो ख़ुशी मिली जिसके बिना उसकी जिन्दगि, जिंदगी नहीं बल्कि एक जेल में रह रहे कैदी जैसी थी जो जी तो रहा था लेकिन किसी की षर्तों पर।

आखीर जब उसका मै नहीं माना तो उसने गाँव जाने की ठान ली। पूछना किस्से था बस उसे सूचना देनी थी वो उसने फॉर्मेलिटी पूरी की और चल पड़ा कार लेकर गाँव में। लगातार ८ घंटे की ड्राइव ने ही उसे नहीं थकाया। मीना से मिलने की तड़प उसे बेचैन किये जा रही थी। उसका मन कह रहा था की मीना उसका इंतज़ार कर रही होगी। हाँ थोड़ा नाराज़ होगी की बताये बिना में चला गया लेकिन में सब समझा दूंगा इसे की ये सब इतनी जल्दबाजी में हुआ की में बताना ही भूल गया। मीना का दिल बहुत बड़ा है मुझे जरूर माफ़ कर देगी।

कसी तरह वो पूछ पाच के गाँव पहुँच ही गया। लेकिन जैसे ही उसने गाँव में कदम रखा सब उसे धिक्कार कि नजर से देखने लगे। उसे बड़ा ताज्जुब हुआ लेकिन उसने सब अनदेखा कर दिया और सीधा अपनी दादी के यहाँ चला गया। उसकी दादी बड़ी खुश हुयी ये देखकर की अब अजय ठीक हो गया है और वो खुद गाडी ड्राइव करके यहाँ उससे मिलने आया है लेकिन उसके ख्यालों को अजय के वाकया ने चकनाचूर कर दिया “नानि, मीना कहाँ है। मैं रास्ते में तालाब और जहाँ जहाँ हम मिलते थे सब जगह देखा लेकिन वो मुझे कहीं नहीं दिखि। आपको पता है कुछ उसके बारे में”

“नाहीं बेटा मुझे कुछ नहीं पता उसके बारे में” नानी ने छलकते हुए जवाब दिया। “तो आराम कर में तेरे लिए चाय नास्ते का इन्तेजाम करती हू। तक गया होगा इतनी दूर से गाडी जो चला करा रहा है”

“नहीं नानी में वैसे तो थका नहीं हूँ लेकिन हाँ भूक बड़ी ज़ोरों की लगी है। वहाँ घर का विलायती खाना खा खा कर में तंग आ गया हू। अब तो मुझे बस आप अपने हाथ की गरमा गरम रोटी मक्खन के साथ खिला दो।”

“जरूर मेरे राजा बेटा को में अपने हाथों से खिलौंगी। मुझे पता है तुझे मख्खन के साथ रोटी खाना कितना पसंद है। तू हाथ मुंह धो कर फ्रेश हो ले तब तक में रोटियां सकती हूँ”

अजय ने अपना तोलियां लिया और घुस गया बाथरूम में। १० मं में फ्रेश होकर बहार आया और नानी के साथ बैठ कर रोटियॉँ का आनंद लेने लगा “वह नानी आपके हाथों में तो जादू है। मन करता है बस खता ही जौं, खता ही जउन लेकिन ये कम्भख्त पेट साथ छोड़ देता है। पेट भर गया है लेकिन मन नहीं भर।”

“नानी में अब बाहर घूमने जा रहा हु। मीना से भी मिल लूंगा”

“अरे बेटा शाम घिर आयी है। यहाँ के मौसम का भी कुछ पता नहीं कब ब्बिगेड जाए। इस समय कहीं मत जा। सुबह जाना जहाँ भी तुझे जाना है”

“ठीक है दादी जैसा आप कहॉ।” कहकर अजय अपने कमरे में चला गया और सोने की कोशिश करने लगा।। नींद उसकी आंखों से कोसो दूर थी। उसे तो बस कल का इंतज़ार था जब वो अपनी मीना से मिलगा।

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रात भर वो करवटें बदलता रहा और सुबह का इंतज़ार करता रह। अगले दिन सुबह जैसे ही सूर्य की पहली किरण ने धरती को चु कर उसे जगाया अजय ने भी तुरंत बिस्तर छोड़ा और दौड कर तालाब किनारे पहुँच गया। उसने नानी को जगाना ठीक नहीं समझा और मीना से मिलने की बेकरारी उससे रोकी नहीं जा रही थी।

तलाब पर पहुँच कर वो इंतज़ार करने लगा की कब मीना आये और उसकी आँखों को अपने प्यार का दीदार हो। पता नहीं कितनी लड़कियां आयी और कितनी चली गयी लेकिन आजय को किसी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसका दिल घबरा रहा था और मीना की सलामती की दुआ माँग रहा था। कहते हैं अगर दुआ सच्चे मन से मांगी जाए तो वो कभी खली नहीं जाती। आज भी वोही हुआ और अजय को मीना आती दिखाई दी।

लेकिन ये क्या कल की मीना और आज की मीना में तो जमीन आसमान का अंतर था। कल तक जो मीना खिलखिला कर हँसती थी आज वो एक गूंगी गुड़िया बन कर रह गयी थी। उसके हुस्न का रंग भी फीका पड़ गाय था। आँखें लगातार रोने से लाल थी और पहले से शरीर बहुत कमजोर भि हो गया था। अजय की आँखें नम हो गयी ये सब देख कर। उसने मीना को आवाज़ दी “मीणा”

आवाज़ में इतना दर्द और तड़प थी कि मीना की नजरें अननयास ही उस दिशा की तरफ दौड गयी जहाँ से आवाज आई थी। दोनों की नजर  मिली और और एक अश्रु धारा दोनो की ही आँखों से बहनी शुरू हो गायी। आँखोँ आँखों में दोनों में बात होने लगी और कदम खुद-बी-ख़ुदक दूसरे के नजदीक जाने लगे। जो बातें जुबान कहना चाह रही थी लेकिन कह नहीं पा रही थी वो काम आँखों ने कर दिया था। दोनों एक तक एक दूसरे को देखे जा रहे थे और पास आते जा रहे द।

ईधार दोनों का पास पहुंचना था और एक दूसरे से टकराना था की जैसे डोनो दो जिस्म एक जान बन गै। दोनोने एक दूसरे को इत्नाकास कर बाहों में भर लि, हवा भी नहीं गुजर सकती थी दोनों के बीच। बस एक सन्नाटा था जिसे दोनों के दिल की धड़कन ही भांग कर रही थी। मीना ने अजय के कन्धों को कस कर पकड़ा हुआ था तो अजय मीना के बालों और पीठ को सेहला रहा त।

आचनाक मीना ने अजय को अपने से दूर किया और रोती हुयी वहां से भाग खड़ी हुयी। अजय हैरानी से वहां खड़ा खड़ा देखता रहा की अचानक मीना को क्या हुआ और वो क्यों ऐसे भाग गयी। उसने कई आवाज़ें दी लेकिन मीना ने एक का भी जवाब नहीं दिया और बस वो दौड़ती गयी और अजय भी एक तक वहां देखता रहा बूत बना जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी।

आजय ने अपने मन को तसल्ली दी की शायद इतने बाद मिला हूँ तो थोड़ी नाराज़ है मुझसे। शाम को में उसे मना लूंगा कैसे भी करके। अजय वहां से घर पहुंचा तो दादी ने सवालों की झड़ी लगा दी। कहाँ गया था, क्यों गया त, किस्से मिलने गया था, वगैरह वगैरह”

जैसे तैसे नानी को सन्तुष्ट किया। अजय का दिल ख़ुशी से झूम रहा था क्यूंकि आज बहुत दिन बाद उसे मीना से मिलने का मौका मिला था।

शाम से जो मीना के इंतज़ार शुरू हुआ रात तक चलता रहा लेकिन मीना को कोई अत पता नहीं था। अजय अपने मन को तरह तरह से दिलासा दे रहा था किमीना कहीं फंस गयी होगी, उसे कोई जरूरी काम आ गया होग, वो जरूर आएगी लेकिन कहीं न कहीं मन के एक कोने में ये डर भी था की अब मीणा का स्वाभाव उसे कुछ बदला बदला सा भी लग रहा था। जब वो रट हुए जा रही थी तो ऐसा लग रहा था जैसे हमेशा के लिए जा रही हो। उसकी आँखों में एक दर्द था। तब में बुधु यही समझ रहा था की मेरे आने की इतनी ख़ुशी बर्दास्त नहीं कर पायी।

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थक हार कर अजय अपने घर वापस आ गया। आज भी नींद उसकी आँखों से दूर थी लेकिन आज कारन अलग था। जहाँ कल उसे मीनसे मिलने की उत्सुकता थी वहीँ आज उसकी बेरुख़ी का कारन जान्ने की जिज्ञासा। रातें करवटों में बीत गयी और सुबह की पहली किरण के साथ अजय वापस तालाब पर। लेकिन आज उसकी भगवन ने नहीं सुनी और उसे मीना के दर्शन नहीं हुये। अजय के साथ जब ऐसा दो-तीन दिन हुआ तो उसने एक दिन हिम्मत करके मीना की एक सहेली से मीना के बारे में पूछ लिया।

जब उसने मीना की बेरुख़ी का कारन बताया तो सुनके अजय के होश उड़ गए लेकिन उसे दोनों पक्ष की मिस-अंडरस्टैंडिंग समझ कर उसने मीना से बात करने की सोचि। इसके लिए उसने किसी तरह मिन्नतें करके मीना की सहेली को मान लिया। उसने भी दो प्यार करने वलप्रेमियों के लिए ये काम करना स्वीकार कर लिया।

उसने किसी बहाने से तालाब के किनारे के खेतों में अपने काम से मीना को बुला लिया और अजय को भी वहां पहुँचने को बोल दिया। मीना वहां पहुंची तो अजय को वहां पहले से खड़ा देख कर सकपका गयी और वहां से भगने की कोशिश की लेकिन अजय ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने प्यार का वास्ता देकर उसकी बात सुनने को कहा।

मीना वहां खामोश खड़ी राहि। अजय ने आगे कहा “मुझे सब पता चल गया है की पापा से तुम्हारी क्या बात हुयी और तुम मुझसे क्यों दूर भाग रही हो। अरे पगली पापा को थोड़े ही पता था की हम एक दूसरे से प्यार करते है। उन्होंने तो यही समझा की तुम्हारी कोशिश की वजह से में ठीक हुआ हूँ तो इसका इनाम देना चाहा। अगर उन्हें पता होता की तुम उनकी होने वाली बहू हो तो वो तुमसे क्या ऐसे बात करते”

“तुम समझते क्यों नहीं अजै। मेरा तुम्हारा कोई मेल नहीं है। कहाँ तुम राजा भोजउड़ कहाँ में गंगू टेली। तुम महलों में रेहने वाले राजकुमार और में गाँव की भीकरण। तुम्हारे पापा मुझे कभी नहीं अपनायेंगे। वो कभी नहीं चाहेंगे की एक टाट का पैबन्द उनके मखमली कालीन का हिस्सा बणे। वो कभी हमारे प्यार को नहीं स्वीकरेंगे।”

“मेरे पापा ऐसे नहीं है। वो मुझे बहुत प्यार करते हैं और मेरी हर ख्वाइश बोलते के साथ ही पूरी कर देते है। हालाँकि समय बहुत कम हैं उनके पास लेकिन जितना भी समय होता है दुनिया भर की ख़ुशी मेरे दामन में डाल देते हैं”

“तुम बहुत भोले हो अजै। ये दुनियादारी नहीं समझते। तुम्हे नहीं पता की रेशम और सूत में क्या फर्क है। खिलोने लाना और घर के लिए बहू लाना दोनों अलग अलग बातें है। वो कभी नहीं चाहेंगे उनका एकलौता वारिस एक गाँव की गँवार अनपढ़ लड़की से शादी करके उसे उनके घर की बहू बनाय”

“अगर पापा नहीं माने तो में वो घर छोड दूंगा लेकिन तुमसे अलग नहीं हो सकता। क्या तुम मेरा साथ दोगी। तुम साथ दो तो में दुनिया की किसी भी मुसीबत से अकेला लड़ सकता हू। मुझे अपने ऊपर पूरा भरोसा है की में तुमने दुनिया जहाँ की खुशियां दे सकता हू। अगर तख्तों ताज न भी दूं तो फूटपाथ पर भी नहीं रहने दूंगा।”

मीना ने आखिरी परीक्षा लेते हुए उससे कहा “अगर तुम मुझसे शादी करोगे तो हो सकता है तुम्हारे पापा तुम्हें घर से निकल दे, जायदाद से बेदखल भी कर दे। तुम रोटी रोटी को मोहताज़ हो जाओ तब तुम मेरा तो क्या अपना पेट भी नहीं भर सकते। फिर क्या फायदा ऐसे रिश्ते से जिसकी नींव ही कमजोर हो।”

“तुम हमारे प्यार में फायदा नुक्सान कब से देखने लगी। तुम जानती हो की दौलत मेरे सब कुछ नहीं है। तुम साथ दो तो में ये तुम्हें कमाकर भी दे सकता हू। मैं पढ़ा लिखा हू, कंप्यूटर डिप्लोमा है मेरे पास। तुम्हे पैसा ही चाहिए न तो में तुम्हें कमाकर दूंगा बस मुझे तुम्हारा साथ चहिये। दोगी मेरा साथ्, बोलो” कहकर अजय ने अपना हाथ मीना की तरफ बढा दिया।

मीना की आँखों में आंसू थे। उसने अजय का हाथ अपने हाथ में ले लिया और रट हुए कहा “हाँ अजय में मरते दम तक तुमहारा साथ दूंगी, अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता सिवाय मौत के। बस तुम बेरुख़ मत हो जाना मुझसे।”

“ये तुम कैसी बात कर रही हो मीना मेरी हर सांस पर तुम्हारा नाम लिखाःइ। ये जिंदगी जो में जी रहा हूँ तुम्हारी ही दी हुयी है। इस पर सिर्फ तुम्हारा हक़ है। वादा करता हूँ की कभी तुमसे नाराज़ नहीं होँग, कभी तुम्हारे विश्वास को डगमगाने नहीं दूंगा। लेकिन तुमसे भी एक वादा चाहता हूँ अगर वक़्त की किसी आंधी में तुम्हारे कदम लड़खड़ाए और तुम बेवफा बनने पर मजबूर करे तो एक चुरा मेरे सीने में पहले पश्वात करना और फिर बेवफा बन। मैं जीते जी तुम्हें किसी और का नहीं देख सकता”

“ओह! अजय तुम मुझे कितना प्यार करते हो।”

“अपनी जान से भी जयद। चाहो तो कभी भी आजमा कर देख लेना”

दोनो के होंठ आरसे बाद एक दूसरे से ऐसे मिल गए जैसे जन्मों से बिछड़े हो और अब कभी आजाद न हो जाए। अजय ने फैसला कर लिया की वो शादी करेगा तो सिर्फ मीना से नहीं तो किसी से भी नाही न।

धीरे धीरे दोनो का प्यार परवान चड़ने लगा। कहते हैं इश्क़ और मुश्क छिपाए नहीं छुपते। बस वोही हाल दोनों का भी था, जल्दी ही दोनों की प्रेम कहानी का सारे गाँव को पता चल गया। गाओं वाले जा धमके अजय की नानी घर। अजय उस समय वहां नही, सब अजय की नानी को धमकी देकर चले गए की अगर अजय को नहीं रोका तो आगे के लिए वो लोग जिम्मेवार नहीं होगे। नानी का रुतबा था गाँव में इस्लिये किसी ने अब तक अजय को हाथ नहीं लगाया था वर्ण उसको काट कर फेंक सकते थे वो लोग।

आजय वापस आया तो नानी ने उससे सब बता दिया और कहा की वो मीना से मिलने की कभी कोशिश नहीं करेगा और न ही उसके बारे में कोई बात करेंगा। वो कल ही शहर जा रहा है अपने पापा के पास क्यूंकि आज रात ही उसके पापा उसे लेने आ रहे है। सुनकर अजय के पैरों से जमीन निकल गई। वो जैसे घर में घुसा था वैसे ही वापस दौड गया मीना के पास। गाओं वालों ने उसे रोकने की कोशिश की तो उसने आखिरी मुलाक़ात की बात कह कर इज्जाजत ले ली। गाओं वालों ने भी नानी का मान रखते हुए लेकिन अपने सामने ही बात करने का मान लिया।

आजय को कुछ नहीं सूझ रहा था की वाक्य कह और कैसे कहे। लेकिन उपरवाला हमेशा ही सच्चा प्रेमियों का साथ देता है। तभी तेज आंधी आयी और अजय ने मौके का फायदा उठाते हुए मीना के कान में रात को भगने का प्लान बता दिया। मीना की तरफ से हामी मिलने पर दोनों अलग हुए और अजय अपने घर वापस आ गया। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।

आजय के घर पहुँचते ही घनघोर बदल छा गए और घमासान बरसात शुरू हो गायी। गाओं वालों ने ऐसी बरसात पहले नहीं देखी थी कभी। बरसात होती थी लेकिन थोड़ी बहुत। हिल स्टेशन होते हुए भी वहां मौसम खुशनुमा रहता था। हलकी हलकी बरसात ही वहां हुआ करती थी लेकिन आज तो जैसे इन्द्र देव रुष्ट हो गए थे।

रात भर में इतनी बारिश हो गयी बदल फटने की वजह से जितनी गाँव वालों ने सैकड़ों सालों में भी नहीं देखि थी। जिससे पानी और बढ़ गया और गाँव में घुस गया। इधर पानी तेज रफ्तार से बह रहा था तो दूसरी तरफ अजय और मीना भगने का प्लान बना रहे थे। दोनों घर से निकले और अपना सामान उठा के स्टेशन की तरफ दौड पड़े। तभी कुछ गाँव वालों की नजर उन पर पड़ गयी और वो भी उसके पीछे दौड लिए लाठी लेकर। “अरे कोई पकड़ो इस लौंडे को, हमारे घर की बेटी भगा कर ले जा रहा है”

कब ये गाँव रुढ़िवादि प्रथा कोबअब भी मानता था। जिस गाओं में एक लड़का और दूसरी बिरादरी की लड़की एक दूसरे से बात तक नहीं कर सकते थे वहां साथ में भाग जाना गाँव वाले कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। सबने आँखें मूंद के एक आवाज़ लगा ली की कैसे भी करके दोनों को पकड़ कर मार डाला जाये ताकि दूसरे युवक युवतियां इस घटना से सलाह ले सके और ऐसी किसी भी तरह की कोई गुस्ताखी करने की कोशिश भी न करे।

जलदी ही काफी गाँव वाले इकठ्ठा हो गए और उन दोनों को घर लिया। फिर क्या था आजय पर लाठियां कि बरसात शुरू हो गयी। लेकिन अजय की जुबान पर एक ही नाम था मीन। मीना जिसे गाँव वालों ने पकड़ रखा था अपने आप को छुड़ा कर अजय के सामने आ खड़ी हुयी और उस पर पड़ने वाली लाठियाँ अपने शरीर पर बर्दास्त करने लगी। लेकिन तभी अचानक पानी गाँव में तेजी से आया और सब बहा ले गये। खेत खलिहाण,घर, घर का समान, रिश्ते नाते सब बह गए। अजय और मीणा भी इस पानी में बह गए लेकिन दोनों ने अपने हाथ नहीं छोडे बस कसकर अपने आप को पकडे रखा। सब गाँव वाले अपने अपने बचाव का रास्ता ढूंढने लगे। कोई पहाड़ी पर चढ़ रहा था, तो कोई ऊँचे मकान पर, कोई पेड़ की ऊँची दाल के सहारे था तो कोई पानी में तैरते लकड़ी के तख़्तों पर।

धीरे धीरे दो दिन में पानी कम हुए तो जन जीवन सामान्य हुये। अजय और मीना की काफी तलाश की गयी लेकिन कुछ पता नहीं चला। दोनों की प्रेम कहानी बस वहीँ उन्ही के साथ बह गयी।.

धीरे धीरे गाओं में आयी बाढ़ का पानी कम होने लगा। गाओं वालों ने पानी कम होने पर सारी जगह छान मारा लेकिन अजय और मीना का कहीं पता नहीं चला। गाओं वालों को तो कटो तो खून नहीं। उन्होंने तो सोचा था की शहरी लौंडा है, जान से मारने की धमकी देंगे तो खुद ही गाँव छोड़कर वापस शहर चला जायेगा लेकिन यहाँ तो मामला ही उलट गया। इस बाढ़ रूपी विपदा ने तो सब तबाह करके रख दिया।

गाँव वालों को भी अब उनकी मोहब्बत पर विश्वास हो चला था। उन्होंने मान लिया था की दोनों की मोहब्बत पाक और सच्ची थी। गाओं वालों ने उन्हें अलग करने की सोची तो भगवान उनसे नाराज़ हो गये और उनकी फ़ासल, गहर, खेत सब बार्बाद कर दिया। जब जी कर न मिल सके दो प्रेमी तो उन्हें मौत के द्वारा मिला दिया। उनका प्रेम भी अमर हो गया।

नानी ने रोते हुए एमनहूस खबर विजय मल्होत्रा तक पहुंचायी। जिस समय ये खबर नानी सुना रही थी उस समय अजय की शादी की चर्चा घर में हो रही थी। अजय की मम्मी अपनी बहू के लिए फैशनेबुल ड्रेस्सेस,गेहने इत्यादि पर विचार विमर्श कर रही थी लेकिन इस खबर तो सुनकर तो जैसे सबके पाओं से जमीन निकल गयी। किसी को भी विश्वास नही आ रहा था इस बात पर। एक लम्बी ख़ामोशी छा गयी कुछ देर के लिए जिसे अजय की मम्मी की रोती हुयी चींखोंने भांग किया।

जो समां कुछ देर पहले ख़ुशी और उल्लास से भरा था वोही अब दुःख और मातम में तब्दील हो गया था। सब्का रो रो कर बुरा हाल था खासकर अजय की मम्मी का जिसका एकलौता बेटा इस हादसे का शिखर हो गया था। विजय ने फ़ौरन गाडी निकलवायी और तुरंत गांव के लिए पत्नी समेत निकल पड़ा। वहाँ जाने पर उन्हें अपनी माँ से अजय और मीना के रिश्ते के बारे में पता चला। साथ ही पता चला अपनी कमियों और ख़ामियों का।

आजय के न ठीक होने का कारण भी उसके माँ-बाप थे ये जानकर दोनों बहुत दुखी हुये। विजय ने जहाँ प्राथना की भगवान से की अगर एक बार उनका बेटा वापस आ जाये तो वो सारा बिज़नेस एक तरफ़ा करके अपना ज्यादातर समय सिर्फ और सिर्फ अपने बेटे के साथ बिताएंगे वहीँ अजय की माँ ने भी किटी पार्टीज से तौबा कर ली। अगर ये पार्टीज ही उसके बेटे की मौत की जिम्मेदार है तो वो इन पार्टीज को लात मार देगी भले ही वो कितने ही बड़े घर से ओर्गनइजे क्यों न हो।

विजय ने काफी सोर्सेज लगाकर अजय को ढूढ़ने की बहुत कोशिश की लेकिन कोई कामयाबी हासिल नहीं हुयी। जब सारी कोशिशें बेकार साबित हुयी तो जैसे उसे एक सदमे ने घेर। उसकी सब उम्मीदें खत्म हो गयी की अजय कभी घर भी वापस आ सकता है। लेकिन अजय कि माँ अब भी अजय को मरा हुआ मानने को तैयार नहीं थी। आखिर माँ का दिल जो हा कैसे मानता। रो रो कर उसकी आँखें सूज गयी थी लेकिन उस बहते पानी का कोई मोल नहीं था।

दुखि मन से अपनी माँ को साथ लेकर विजय शहर आ गया। विजय की माँ ने काफी समझाया किय उनके पुरखो की जमीन जायदाद है वो यहाँ से नहीं जाएगी लेकिन विजय की दलीलों के आगे उनकी एक न चली। विजय ने कहा की वो अपना बेटा तो खो चूका है यहाँ अब अपनी माँ को नहीं खोना चाहता।

विजय अपने परिवार के साथ वापस शहर आ गया। लेकिन जहाँ पहले वो पैसा कमाने की दौड में सबसे आगे रहता था वहीँ अब उसने ऑफिस भी जाना कम कर दिया था। अब जाता भी तो किसके लिय, पैसा कमाता भी तो किसके लिय। उसका एकलौता बेटा तो अब रहा नहीं। ये जमीन, जायदाद किस लिए और किसके लिए बढाये ओ। उसका मन भर गया था इन सब चीज़ों से। दिन रात बस वो अपने कमरे में बैठा रहता और कुछ सोचता रहता।

नतीजा ये हुआ की धीरे धीरे बिज़नेस घाटे में जाने लगा। उसके मैनेजर्स, उसके दोस्तों ने उसे बहुत समझाया लेकिन उस पर कोई असर नहीं पडता। अब बिज़नेस से उसका दिल ऊब गया था। बस दिन भर अजय के कमरे को ताकता रहता। उसके खिलोनो को देखता, अजय इससे ऐसे खेलते था, इसके साथ वैसे खेलते था। अजय की फोटो एल्बम को दिन भर निहारता रहता था। कब अजय ने क्या किया ये तस्वीरें जैसे उसे सामने से बता रही हो ऐसा उसे लगता था।

आजय की माँ का भी कम बुरा हाल नहीं था। सहेलियों से तो जैसे उसका दूर दूर तक कोई नाता ही नहीं रह। पार्टी तो दूर की बात उन्होंने किसी से मिलना जुलना और बात करना भी बहुत कम कर दिया था। लेकिन उसने किसी तरह अपने आप को संभल कर रखा था और इसका एक ही कारण था उसका पती। उसके पति की ये हालत है और अगर वो भी टूट जाती तो वो जिन्दा ही नहीं रह पाते। किसी ने इस घर को संभल रखा था तो वो भी अजय की दादी। उन्होंने ही शांत ढंग से सब काम जैसे अग्नि संस्कार, तेरहवी सम्पन किय और घर का सञ्चालन करने लगी।

विजय का तो सब जगहा जाना ही बन्द हो गया था। केवल कोई इम्पोर्टेन्ट मीटिंग हो ऑफिस में या बहुत जरूरी काम हो तभी वो बहार निकलत। उसके मैनजर्स ही सारी रिपोर्ट उसे घर पर दिखलाया दिया करते थे। उसकी माँ काफी कहती उसे बहार जाने या घूमने के लिए लेकिन हर बार विजय ताल जाया करता था। और तो और विजय तो कोई पार्टी या फंक्शन भी नहीं अटेंड करता था।

ऐसे ही डेढ़ साल बीत गए और बिज़नेस में घाटा होने लगा। और कोई होता तो कबका सड़क पर आ जाता लेकिन विजय का बिज़नेस इतना फैला हुआ था की इतना नुक्सान होने पर भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा लेकिन नुक्सान तो आखिर नुक्सान ही है।

विजय शायद ऐसे ही रेहने वाला था लेकिन एक दिन अचानक उसकी जिँदगी बदल गयी।

हआ ये की विजय के फैमिली डॉक्टर विशाल की बेटी की शादी फिक्स हो गयी। अब विशाल विजय का फैमिली डॉक्टर था और उससे बढ़कर उसका खास दोस्त तो विजय को तो हर हाल में जाना ही था। लड़के वाले शादी अपने गाँव में ही करना चाहते थे जहाँ उनकी पुस्तैनी जमीन और हवेली थी। इसलिए विजय को दादी ने पहले ही शादी अटेंड करने के लिए जाना पड़ा।

विजय ने गाँव जाने के लिए अपनी कार से ही जाना मुनसिब सम्झ। ४ घंटे के सफर था लेकिन विजय को तो बिज़नेस टूर के चलते पहले से हीटनी लॉन्ग ड्राइव्स की आदत थी। बस दो दिन पहले ही विजय निकल पड़ा गाँव जाने के लिये। विशाल और उसका परिवार पहले ही वहां पहुँच गया था क्यूंकि सगै, संगीत वगैरह का सब प्रोग्राम वहीँ था जो तीन चार दिन चलने वाला था।

विजय कार से चला जारहा था। करीब तीन घंटे का सफर करने के बाद वो थोड़ा थक सा गया तो उसने कुछ आराम करने की सोची। बीच में एक झोपड़ा जहाँ उसने थोड़ा समय बिताने और हल्का सा चाय नाश्ता करके आगे के सफर के लिए एनर्जी लेने का मन बनाया। विजय ने अपनी कार गाँव के अंदर ली और एक चाय नास्ते की दूकान के पास जाकर रोक ली। वहाँ उसने एक चयौर एक बिस्कुट पैकेट का आर्डर दिया और वहीँ रखे हुए एक बेंच पर बैठ गया।



थोड़ी ही देर में चाय और बिस्कुट विजय को मिल गए जिसे वो आराम से बैठकर खाने पीने लगा। चाय पीते पीते उसकी नजर सामने गेहूं के गोडाउन पर पड़ी जहाँ कुछ मजदूर गेहूं के बोर अंदर से बहार ला कर एक ट्रक पर लोड कर रहे थे। एक लड़का उनकी गिनती करता जा रहा था और अपने हाथ में पकडे हुए रजिस्टर में नोट करता जा रहा था।

विजय एक दम चौंक गया उस लड़के को देख्कर। उसने चाय आधी अधूरी छोड दी और उसके पैसे देकर सामने गोडाउन की तरफ चल दिया। वहाँ जाकर वो हैरान रह गया। उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। उसे लगा जैसे वो कोई सपना देख रहा है। सामने अजय खड़ा था। दाढ़ी बढ़ी हुयी, थोड़ा कमजोर लेकिन इरादा में मजबूत, और आँखों में एक चमक्।

यही हाल अजय का भी था, उसे हैरानी और ख़ुशी एक साथ हो रही थी। आज डेढ़ साल बाद वो अपने पापा को देख रहा था, उनसे मिल रहा था। दोनों की आँखों से ख़ुशी के आंसू बह रहे थे। एक दूसरे को देखते हुए दोनों आपस में गले लग गए। काफी देर तक दोनों रोते रहे और जब थोड़े शांत हुए तो अजय ने कहा पापा चलिए घर चलते है। आपकी कोठी जितना बड़ा तो नहीं है लेकिन चार छुपाने के लिए काफी है।

“बेटा ये तू क्या कह रहा है। और यहाँ ये सब तू घर पर क्यों नहीं आया। वहाँ सब तेरे लिए परेशान हैं”

“पापा घर चलिए पहले आपको सब बताता हूँ”

दोनो पैदल ही चल पडते है। घर पहुँच कर अजय आवाज़ लगाता है “मीना कहाँ हो। देखो तो कौन आया है”

मीना अंदर से बहार आती है तो एक बार तो विजय को देख कर चौंक जाती है लेकिन फिर जल्दी ही खुद को संभलकर उनके पैर छूती है। विजय उसे आशीर्वाद देता है और तीनो घर के अंदर आ जाते है। अंदर आते ही विजय के पाँव ठिठक जाते हैं क्यूंकि उसकी नजर सामने पलने में खेल रहे एक छोटे बच्चे पर पड़ती है। वो पलने के नजदीक जाता है और घुटनों के बल बैठ कर उस बच्चे को निहारने लगता है।

हबुहु अजय पर गया एक गोरा तंदुरुस्त बच्चे विजय की और ही देख रहा था जैसे कह रहा हो की मुझे गोद में ले लो। विजय ने उसकी बात मान ली और उसे गोद में उठा लिया। तभी बच्चे ने उसके ऊपर पेशाब कर दिया तो विजय ठहाका लगाकर हँस दिया और बोलै “बिलकुल अपने बाप पर गया है। वो भी ऐसा ही करता था जब छोटा था”

ईसी तरह काफी देर तक विजय उससे खेलत रहा और अजय और मीना आँखों में ख़ुशी के आंसू लिए उन दोनों को खेलते देख रहे थे। थोड़ी ही देर में जब भूख की वजह से बच्चा रोने लगा तो जैसे सबकी तन्द्रा टूटी और विजय वहां से हट गया ताकि मीना बच्चे को ले सके और अपना दूध पिला सके।

मीना बच्चे को लेकर साथ में बने एक दूसरे छोटे कमरे में चली गयी। तब पहली बार विजय की नजर घर पर पड़ी। दो कमरों का एक छोटा सा घर था और ऐशो आराम की तो नहीं लेकिन जरुरत की हर चीज़ वहां थी और वो भी सब करीने से रखी हुयी। विजय को तो रोना आ रहा था क्यूंकि उसका बेटा जो करोडा की जायदाद का अकेला वारिस है यहाँ इस छोटे से घर में रह रहा है। जिसके आगे पीछे सैकड़ों नौकरों की फ़ौज होती थी वो ही आज खुद नौकरी कर रहा है।

शायद अजय ने अपने पापा की मन की बात पढ़ ली थी। उसने अपने पापा को एक चारपाई पर बिठाया और घर के कुशल समाचार लेने लगा। विजय ने सब बता दिया और ये भी बता दिया की वो यहाँ किस काम से आया था। अजय ये सुनकर बहुत खुश हुआ की उसकी दादी गाँव से निकाल कर अब उसके पेरेंट्स के साथ रेह रही थी। इसके बाद विजय ने उससे पुछा “अजय ये बता की तू यहाँ कैसे आया, शादी कब हुयी, बच्चा कब हुये, तू घर क्यों नहीं आया”

बाढ़ में बह जाने के बाद हमें एक लड़की का बड़ा बोर्ड पानी में तैरता दिखाई दिया। बस हमने वो पकड लिया और उस पर चढ़ गए। पूरा दिन हम उस पर तैरते रहे। पानी के थपेड़े लगते रहे जो असहनीय थे। लेकिन हम साथ थे तो एक दूसरे को हिम्मत बड़ा रहे थे। तैरते तैरते हम यहाँ इस गाँव तक पहुँच गए। लेकिन ताकेँ और बुखार के कारण हम बेहोश हो गए। यहाँ गाँव वालों ने हमें सहारा दिया, रहने को घर दिया, एक नौकरी दी और हमारी शादी भी करवायी।

“लेकिन तू घर क्यों नहीं आया”

“डरता था कहीं मेरा प्यार पैसों की ईमारत के नीचे आकर दम न तोड़ दे। आप तो सबसे प्यारा पैसा ही था। मेरी आपको कब फिक्र थी, बस एक फॉर्मेलिटी निभाते थे मेरे साथ”

“मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं तेरा गुनेहगार हु तुझसे अलग होकर ही मुझे पता चला की मेरी असली दौलत तो तू है। अगर तू ही नहीं होगा तो इस धन दौलत का क्या में अचार डालुंगा । मेरी दुनिया अब तेरी ख़ुशी से शुरू होकर तेरी ख़ुशी पर खत्म है। घर चलते हैं बेटा। तेरी मम्मी और नानी तेरा इंतजार कर रही हैं”

“तो इसका मतलब आप मीना को अपनी बहु स्वीकार कर रहे हैं”

“मैंने तो उसे अपनी बहू तभी मान लिया था जब मुझे पता चला कि तू और वो एक दूसरे को प्यार करते है। बल्कि में तो चाहता था की तुम दोनों की शादी धूम धँसे कराऊँ लेकिन…। खैर छोड़ो और घर चलने की तैयारी करो। मैं अपने पोते को दुनिया भर की ख़ुशी और ढेर सारा प्यार देना चाहता हूँ”

“अजय की आँखें भर आयी ये सब सुन कर, वो अपने पापा के गले लग गया। मीना ने ही अंदर से सब सुन लिया था और उसकी आँखों में भी ख़ुशी के आंसू छलक रहे थे। अजय ने गोडाउन के मालिक से बात करके नौकरी छोड दी। गाओं वाले अजय की असलियत जानकर हैरान रह गए की इतना बड़ा आदमी उनके साथ डेढ़ साल से एक आम आदमी की जिंदगी जी रहा था। सबने दुखी मन से तीनो को विदाई दी और तीनो निकल पड़े विशाल की बेटी की शादी अटेंड करने के लिए”

विशाल भी अजय को जिन्दा देखकर बहुत खुश हुये। उसे सबसे ज्यादा ख़ुशी तो अपने दोस्त के लिए थी क्यूंकि उसकी बदरंग जिंदगी में फिर से खुसियों के रंग भर गए थे। इसके बाद तो जैसे शादी में धूम मच गयी थी। सबने खुद नाचा और आखिर में विदाई होने के बाद सब घर के लिए चल पड़े।

घर पर पहुँचने के बाद विजय अंदर गया और सब नौकरो को अजय के स्वागत के लिए तैयार कर दिया। अजय की मम्मी और उसकी दादी तो ख़ुशी के मारे रो पड़ी। वो दोनों तो नंगे पैर ही अजय को देखने के लिए बहार दौड पड़ी। नंगे पैर इसलिए क्यूंकि जब उन्हें ये खबर मिली थी तो वो दोनों घर में बने मंदिर में पूजा कर रही थी और सुनकर इतनी खुश हुयी की चप्पल पहनने का किसी को भी होश नहीं रहा।

अजय दरवाजे पर मीना और अपने बेटे के साथ खड़ा मुस्कुरा रहा था। अजय की मम्मी और नानी तीनो को देखकर बहुत खुश हुयी। अजय की मम्मी ने मीना की आरती उतारी और पूरे रीति रिवाजों के साथ घर में प्रवेश करवाया। पूरा दिन सबका एक दूसरे का हाल जानने में और पिछली बातें को बताने में बीत गया।

दो चार दिन घर रहने के बाद अजय और विजय दोनों ने साथ में ऑफिस जाना शुरू कर दिया। वहाँ अजय को कुछ घोटाले मिले जिसे उसने अपनी पैनी नजरों से पकड़ लिया और गुनहगार को नौकरी से निकल कर उनकी जगह दूसरे कर्मचारी रख लिये। धीरे धीरे बिज़नेस अपनी रफ़्तार फिर से पकड़ने लगा और जल्दी ही पहले से भी ज्यादा सक्सेस हो गया।

सब अपनी लाइफ में खुश थे। जहाँ अजय ने पूरी तरह ऑफिस संभल लिया था तो मीना ने पूरा घर। विजै, उसकी पत्नी और उसकी माँ तीनो को तो एक खिलौना मिल गया था खेलने के लिए अजय के बेटे के रूप में।

Ladka Ladki Ki Ek Kahani Hindi Me

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