Adsense

Horror Story In Hindi Part 5

इस कहानी के पिछले पार्ट पढ़ें

पार्ट 1

पार्ट 2

पार्ट 3

पार्ट 4

Horror Story In Hindi

Horror Story In Hindi, Hindi Horror Story, Hindi Horror Kahani, Bhoot Pret Pishach Stories, Illumination Hindi Story


हफ़ीज़ – उफ़ हो माहि फिर वही बात कब समझोगी यह सिर्फ एक वहम था

माही – हो सकता है शायद जो कल रात मैंने देखा वह वहम ही हो वो घोड़ों पे सवार लोग काले लीबाज़ सब दिमाग का भ्रम हो

हफ़ीज़ – रिलैक्स अगर तुम ऐसे मूड ख़राब करोगी तो मेरा भी मूड ख़राब पता है कितने पैसे लगे है इस कॉन्ट्रैक्ट को लेके चलो चाय पियो


नोकर जो चाय देके बागान की तरफ जा रहा था उसने एक बार घूरके माहि की बातें सुनी… "अरे हाँ मैं तो बताना भूल गयी मैंने इस हवेली के ठीक नीचे वाले कमरे में एक गुप्त दरवाज़ा देखा है”…। हफ़ीज़ ने चाय रखके माहि को एकटक देखा फिर गम्भीरता से चश्मा को ठीक करता हुआ सोचने लगा

“तुमने कमरे के ठीक नीचे उफ़ हो अब ये कौन सी नयी बात है कल फिर तुमने रात को सपना देखा होगा”…हफ़ीज़ ने चाय की चुस्की लेके मुस्कराया

“नहीं सच”…माहि के कहते ही हफ़ीज़ उठा


“तो चलो फिर ज़रा देखें तो आखिर इस महल में और क्या क्या है?”…। हफ़ीज़ मुस्कुराके माहि के साथ महल की तरफ जाने लगा…नौकर एकदम ठिठक के बस दोनों को महल के अंदर जाते हुए सहमी निगाहों से देख रहा था ना जाने उसके दिल में कौन सा ऐसा देहशत था जो उसकी आँखों में आ गया


हफीज़ ने झट से उस पुराने दरवाज़े को खोला दरवाज़े के अंदर पूरी तरह से मिट्टी धुल और चारो और खण्डार जैसा महौल था… हफ़ीज़ बड़ी मुस्किल से अंदर आया। जनदार इतना अँधेरा था की बस अंदर के खिड़की से आ रही थोड़ी सी रौशनी घर में उजाला दे रही थी…। हफ़ीज़ जैसे अंदर आया साथ में माहि भी थी चारो और दीवारे फट सी गयी थी, अंदर के चीज़ें टूटे हुए थे धुल से नहाये हुए हफ़ीज़ की नज़र जब अचानक से उस मिट्टी में दबे फ़र्श पे बने लोहे जैसे चीज़ पे पड़ी…तो उसने दो तीन पाँव से एक झटके में लोहे को ठोक…धड़ धड़…ये ज़मीन ठोस नहीं थी…और लोहे की शब्द पुरे कमरे और ज़मीन के अंदर भी गुंज रही थी…हफ़ीज़ थोढ़ा हैरान हुआ उसने चश्मे को उतारा और धीरे धीरे मिटटी को हटाते हुए उस ज़ंजीर की और देखने लगा


“यही है वह लोहे का दरवाजा वह देखो ज़ंजीर इसके अंदर ज़रूर कुछ है”……माहि ने लगभग बौखलाते हुए बोल

“हम्म्म देखके तो लग ही रहा है हो भी क्यों न इतने सालो से बंद ये जाघ थी और ये पीतल का ताला भी देख के ही लग रहा हैं की काफी पुराण हैं इसकी चाबी भी तो नही है खण्डार के मोयने में ये तो पता नहीं चल पाया”…… हफ़ीज़ लगभग सोचता हुआ बढ़बढाया


“एक काम करते है मार्क”…। जलद ही नौकर मार्क कमरे में हफ़ीज़ के बुलाने पे आया हु बस कमरे के दरवाजे के पास खड़ा काँप रहा था…एक बार माहि ने उसे देखा और फिर हैरानी से उसे घूर्णे लागी, हफ़ीज़ चेहरे को सख़्त किये उठ खड़ा हुआ

“क्यात तुम जानते हो ? की इस राज महल में कोई ख़ुफ़िया दरवाजा भी था”… हफ़ीज़ ने वहां के वासी और अपने नए नौकर मार्क से ये बात कही

“जी नही साहेब”…मार्क ने उत्तर दिया

“ठीक है एक कुल्हाडी लाओ मैं अभी इस ज़ंजीर को तोड़के इसके अंदर देखूँगा आखिर है क्या? मुझे तो लगता है बरसों पहले राजा ने खजाना या फिर कोई ख़ुफ़िया रास्ता बनाया होगा छूपने के लिए यहाँ पे” हफ़ीज़ ने जैसे ये बातें कही मार्क और काँपने लगा

“नं…नही साहब इसे मत खोदिये हम यहाँ के किसी भी एक चीज़ को नहीं छुये है कभी…। इसे अगर आपने खोला तो यकीनन कुछ हो जाएगा” मर्क की बात सुनके माहि भी देहशत में डूब सी गयी

“ओह्ह शीट उसे छूने से क्या हो जाएगा? और वैसे भी सरकार का अब इस ज़मीन पे पूरा हक़ है आखिर उन्हें भी तो इन राज़ के बारें में पता चले जाओ कुल्हाडी लाओ और तोड़ो इस ज़ंजीर को” हफ़ीज़ के कहने पे मार्क डर से बिधबिधाने लगा

“नही नही मैं नहीं खोलूँगा मैं नही तोडूंगा में जा रहा हूँ साहेब प्लसस मुझे जाने दीजिये”… मार्क एकदम भाउक्ला गया इस बार माहि सहम उठी

“अच्छा ठीक हैं ठीक हैं मत खोलो मैं ही तोड़ता हूँ जाओ जल्दी से कुल्हाडी लाओ” हफ़ीज़ के कहने पे कई बार मार्क ने रोकना चाहा माहि को भी एक पल डर लगा की लेकिन हफ़ीज़ अपनी बात पे रहा।


धाधससस ढाढ़ससस धधसस्स ज़ंजीर पे ज़ोर ज़ोर से मारते उस नुकीले कुलदी के वार से ज़ंजीर और लोहे का दरवाजा काँप जाता और उसी के साथ पुरे महल में आवाज़ गूँजती…हफ़ीज़ मज़बूती से को मारे जार कहा था… ढ़ाढ़ससस ढ़ाढ़ससस ढाढ़स…हर एक आवाज़ से माहि और मार्क दोनों काँप रहे थे…। ज़ंजीर लगभग टुटने के कगार पर आ गयी। एक और वार और उसके बाद खानाक से ज़ंजीर अलग हो गयी हफ़ीज़ ने झुकके ज़ंजीर को पूरी तरीके से उठाके एक और फेंक दिया फिर उसे लोहे के दरवाजे के ऊपर बने मोठे कुण्डी को देखने लगा…। हफ़ीज़ ने जैसे हाथ लगाना चाहा अचनक से उसका फ़ोन बज उठा… एक पल के लिए माहि काँप गई। हफ़ीज़ थक्के खड़ा हुआ और मोबाइल पे चार्ल्स का कॉल देखके उससे बात करने लगा


हफ़ीज़ ने चार्ल्स को महल के इस ख़ुफ़िया दरवाजा के बारें में जब बताया तो चार्ल्स भी हैरान हो उठा। ”जी सर मेरी वाइफ कल रात को यहाँ आयी तो उसने कोई शब्द सुना बाद मैं उसे खिड़की लगते वक़्त ये लोहे का दरवाजा दिखा”……हफ़ीज़ ने फ़ोन कट करते हुए माहि की और मुस्कुराक देखा


हफ़ीज़ : सर ने मना किया है की कोई भी  चीज़ को खोलू न जिससे सरकारी लफ़ड़े भरे ये काम एनालिस्ट का है चार्ल्स खुद यहाँ आके मायना करेंगे और उसके बाद ही कुछ हो सकता है खैर अभी तो इस कुण्डी को लगे ही रहने दो अब चार्ल्स आय फिर देखेंगे आखिर इसके अंदर है क्या?


माही एकदम चुपचाप उस लोहे के दरवाजे की और देख रही थी…हफ़ीज़ उसके काँधे पे हाथ रखके उसे ऊपर ले आया…कल रात वैसे ही नींद उड़ चुकी थी एक तो वह काले लिबास में दिख रहे सैनिक मानो जैसे आत्मा थे और अब ये ख़ुफ़िया दरवाजा का राज़…मार्क लेकिन सहमा हुआ था…। वाहः उस दिन बढ़बढ़ाता हुआ माहि और हफ़ीज़ की बातें को सुनके जल्द ही खाना बनाकर महल से चला गया


रात काफी हो चुकी थी, हफ़ीज़ लैंप की रौशनी में टेबल पे कागज़ पे स्केच तैयार कर रहा था, होटल पैलेस का उसने पहले महल के नक़्शे को बड़े बारीक़ी से देखा और फिर सोचते हुए ड्राइंग बनाने लगा पेंसिल की आवाज़ से हॉल में खामोशी से निकल रहा था।  उपर अपने कमरे में माहि एक नावेल पढ़ रही थी उसका मन आज सोने को नहीं लग रहा था… कुछ ही देर में हफ़ीज़ की आँख लग गयी और वह चश्मा उतार के वही टेबल पे सर रखके सो गया…। लैम्प की रौशनी से पूरा हॉल आधी अँधेरे में जगमगा रहा था…। टिक टिक टिक रात के १२ से ऊपर घरी की सुई जा चुकी थी…। अचानक हफ़ीज़ के चेहरे पे मानो जैसे कोई ठण्डी हवा का झोंका लगा। हफ़ीज़ एकदम से हवा से सिहरके उठ गया…उसने एक बार चार ओर देखा

“कौन?” हफ़ीज़ ने चश्मा पहनते हुए बोला पुरे हॉल में सिर्फ खामोशी छायी थी खिड़की भी बंद थी हफ़ीज़ को महसूस हुआ जैसे हवा महल के अंदर आयी हो। हफ़ीज़ ने एक बार खिड़कियो की और देखा और फिर लैंप को लिए एक बार सिडियो की और देखा…। कोइ नहीं था सिर्फ महाराजा की मूरति थी दिवार पे लगी पैंटिंग्स


हफ़ीज़ लैंप लिए घर से बहार निकल गया सिगरेट पीने का जो शौक माहि ने बहुत बार मन किया पर हफ़ीज़ सुनता कहा था… उसने लगभग अपनी लाइटर जलायी और एक सिगरेट सुलगाके उसका कष लेने लगा…। अचानक कोई चीज़ झाड़ियो से निकलते हुए हफ़ीज़ के करीब आने लगी…। हफ़ीज़ अपने में मालिन सिगरेट पिए जा रहा था… अचनक हफ़ीज़ को लगा जैसे कोई तेज़ कदमो से उसके करीब बढ़ रहा है हफ़ीज़ ने तुरंत पास रखी लाइटर को जला डाला…और अचानक एक ज़ोर का हवा से हफ़ीज़ एक पल के लिए सहम गया हवा की आवाज़ के साथ वह कदमो की आवाज़ वह साया ना जाने कहाँ मिल गया।


“कौन है? कौन है?”…। हफ़ीज़ ने चारो और देखा…उसके मुंह से सिगरेट कब का निचे गिरके बूझ गया था हफ़ीज़ को अपने बेवकूफ़ी पे हस्सी आयी फिर लाइटर जलाये…वह वापिस महल के अंदर चला गया उसका चमकता लॉकेट जब झाडी में से देख रहे उन आँखों पे पड़ा तो वह साया गररराते हुए अँधेरे में ग़ायब हो गया।


हफ़ीज़ जैसे टेबल के करीब आया…एकदम हैरान होके वह वही ठिठक गया… टेबल पे खुद बनायीं जो स्कैच उसपे लाल स्याही गिरि हुयी थी…। हफ़ीज़ एक पल को छुटा और कागज़ से वह स्याही साफ़ करने लगा कागज़ को झाड़ने लगा लेकिन ड्राइंग बेकार हो चुकी थी उसपे धब्बे पढ़ गए थे हफ़ीज़ को बेहद गुस्सा आया माहि को हफ़ीज़ की आवाज़ सुनके हैरानी हुयी हु दौडती हुयी लैंप लिए सिडियो से निचे उत्तरी सामने हफ़ीज़ को सर पे हाथ रखके बैठा हुआ पाया


“क्या हुआ?” महि ने सवाल किया

“सब बेकार हो गया पता नही कैसी लाल स्याही गिर गयी” हफ़ीज़ ने खुद के चहरे पे हाथ मरते हुए कहा

“लेकिन तुम तो लाल स्याही कभी इस्तेमाल नहीं करते” एक पल को हफ़ीज़ चौंक माहि की और देखने लगा यकीनन उसके पास तो कोई लाल स्याही नहीं है।

हफ़ीज़ ने फिरसे उस कागज़ की और देखा उसपे अब भी लाल धब्बे परे हुए थे माहि भी मुंह पे हाथ रख बैठी उसने चारो और देखा लाल स्याही का कोई पता नहीं था ये रंग गिरा कहाँ से?

“ लेकिन जो भी हो महेनत बेकार पहली बात मेरे साथ ऐसा हुआ है” हफ़ीज़ को ग़ुस्सा आया अपने उपर

“मैं तुम्हें पहले ही बोल रही थी ये महल कुछ ठीक नहीं हैं कभी मुझे जमीन खोदने की कभी उन सैनिको को देखने की ओह कभी ये कागज़ का यूँ ख़राब हो जाना ये महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है” हफ़ीज़ लगभग ग़ुस्से से माहि की और देखने लगा

“तो तुम्हारे कहने का मलतब है मैं ये महल छोड़के चला जाऊ है ना ताकि जो कॉन्ट्रैक्ट मुझे मिला उसपे खड़ा न उतरा सकूं खैर जाने दो मैं जा रहा हूँ सोने अब चार्ल्स आएगा उनका ख़ाक प्रेजेंटेशन दिखा पाउँगा चलो यहाँ अब बैठके मायुस होने से अच्छा है आगे के प्लान्स करू” हफ़ीज़ ग़ुस्से सिडियो से ऊपर चला गया माहि एकदम चुपचाप उस कागज़ को देखते हुए खुद भी ऊपर चली गायी


अचानक हो हो करती हवा से वह कागज़ एक पल में ही उड़ती हुयी उस अँधेरे साये में न जाने कहाँ गुम हो गयी रात करीब ३ बज चुक्का था…अचानक से फिर माहि की नींद टूटी इस बार वही शब्द खच खच…। जैसे कोई मिट्टी खोद रहा हो… माहि धीरे से बिस्तर उठके हफ़ीज़ की और देखते हुए कमरे से बहार निकली मोमबत्ती हवा से बुझ चुकी थी… अचनक उसे ऐसा झटका लगा की एक पल के लिए कलेजा मुंह में आ जाए


ढ़ाढ ढढः ये आवाज़ इतनी ज़ोरदार थी मानो जैसे कोई दरवाजा पीट राह हो। फिर से वो ही आवाज़ ढाढ ढढ्ह, महि एकदम चौंककए थोड़ी सी आवाज़ में बोली हफ़ीज़ आवाज़ न आपके समझ बैठी की हफ़ीज़ गहरी नींद में डूबा है… बहरहाल माहि खुद ही सिडियो से नीचे उतरते हुए काँपती लालटैन को हाथो में लिए नीचे की और गयी, ढाढ ढढः…ये आवाज़ ठीक उसी कमरे से आ रही थी माहि का पूरा जिस्म काँप रहा था। महि धीरे धीरे सिडियो से उतारते ही उस दिशा की और गयी… जैसे जैसे कमरे के नज़दीक जा रही थी वैसे वैसे आवाज़ और भी साफ़ सुनाइ दे रही थी अचनक कसे कोई सफ़ेद चीज़ हवा में लेहराती हुयी सीधे माहि के चेहरे से टकराई माहि चीख उठी…आह्हः लेकिन जैसे ही कागज़ पे नज़र पड़ी उसकी ठहर सी गयी पुरे कागज़ पे लाल लाल निशाँ में शैताननं जैसा चेहरा बना हुआ था मानो जैसे किसी ने पूरा कागज़ को बेदर्दी से ऐसा बनाया हो… माहि सहम उठी अचानक फिर धढ़ ढढः आवाज़ के साफ सुनते ही।


माही का कलेजा काँप गया । महि धीरे धीरे दरवाजे की और बढ़ी…चर चर्र करता हुआ दरवाजा आधा खुला था और अभी पूरा खुल गया जैसे ही दरवाजा खुला अँधेरे में वह शब्द सुनकर महि सहम उठी। धध ढढः इस बार पूरा फ़र्श काँपें जा रहा था…महि एकदम सहमते हुए कलमा पढने लगी… हाथ से मोमबत्ती छूटने को हो गया माहि ने बिना सोची समझी फ़र्श पे बैठके मज़बूती से मोमबत्ती की रौशनी में कमरे के अंदर झाँका…ढाढ ढढ्ह ये वही लोहे का दरवाजा था जो बार बार ऊपर उठता फिर निचे हो जाता मानो जैसे को दरवाज़े को निचे से धक्का दे रहा है खोल्ने के पर कुण्डी के सकती से खुल नहीं प् रही अचानक माहि को कोई शब्द सूना देने लगा…ये आवाज़ ज़मीन के निचे से आ रही थी।


माही ने धीरे धीरे अपना कान ज़मीन पे लगाया… अचानक से उसे कोई मंत्र पढते हुए महसूस हुआ बंद दरवाजे के निचे फ़र्श के भीतर कोई मंत्र पढ़ रहा था उसके साथ मानो जैसे घनन घनन की शब्द्द मनाओ जैसे एक नहीं कई सारे पढ़ रहे हो… फिर दबी आवाज़ किसी के आह आह छिलने की… अचानक से धढ़ ढाढ इस बार लोहे का दरवाजे को कोई जोरसे पीटे जा रहा था।। महि एकदम सहमते हुए दरवाजे से दूर हो गयी और डरी निगाहों से दरवाज़े की और देखने लगी।


माही ने अभी दो कदम ही पीछे किये थे, की तस्वीर मुर्तिया सब हिलने लगी हु आवाज़ माहि के कान में गूँजने लगा घननं घननंन जैसी शब्ब्द के पढते ही माहि जैसे बदहवास होने लगी उसकी आँखें बंद सी होने लगी आंखोके सामने धुँआ सा छाने लगा…। महि बदहवास फ़र्श पर गिरके बेहोश हो गयी


सूबह १० बजे माहि को होश आया…जब हफ़ीज़ ने सीडी के करीब माहि को बेहोश पाया पास में खड़ा मार्क भी डरके देख रहा था… माहि को हफ़ीज़ कब से झिंजोड़के उठाने की कोशिश कर रहा था अपने चहरे के सामने हफ़ीज़ का चेहरा देख माहि एकदम से सहमते हुए हफ़ीज़ से गले लग गई

“माहि माही अरे, क्या हुआ? तुम यहाँ कैसे गिरी?” हफ़ीज़ ने माहि के बालों को सहलाया

“मैने कल रात कुछ आवाज़ें सुनी जैसे कोई ज़मीन खोद रहा हूँ दरवाजा कोई पीट रहा था ज़मीन के निचे मुझे लोगो की आवाज़ सुनाइ दी कोई चीख रहा था कोई मंत्र”… महि बौखलाते हुए जो ब्यान कर रही थी उसे बड़ी बारीकी से हफ़ीज़ और मार्क सुन रहा था मार्क काँपें जा रहा था उसके दिल का डर और बढ़ गया था

“साहेब मैंने आपको कहा था ये महल मानुस है जो भी यहाँ रहा था सब मारे गए” इस बार मार्क ने कह ही दिया हफ़ीज़ ग़ुस्से से चिल्ला उठा

“चुप्प रहो तुम मेरी बीवी को डरा रहे हो भूत प्रेत कुछ नहीं है कहाँ है कुछ…कौन दरवाज़ा पीट रहा था पक्का तुम्हें वहम हो रह है।। हफ़ीज़ की बात से माहि को गुसा आ गया।

“तुम्हें तो कभी इन सब चीज़ो पे यकीन तो था ही नहीं मैं सच कह रही हूँ हु आवाज़ें ओह्ह्ह लोहे के दरवाजे को पीटने का शब्द ज़रूर कुछ है उसके अंदर और मुझे लगता है इन सब के पीछे कोई गहरा राज़ है प्लस हफ़ीज़ यहाँ से चलते है मैं यहाँ नहीं रह सकती” माहि ने हफ़ीज़ को पकड़ के बोलै हफ़ीज़ अपना हाथ हचढाने लगा पर भाउक्लायी माहि को कहाँ संझा सकता


हफ़ीज़ – उफ़ हो तुम्हें कैसे समझाऊं यकीनन तुम्हें सब्कुछ दिखा लेकिन शायद वह सपना हो क्या पता तुमने ज़्यादा सोच लिया हो देखो ये महल काफी सालो से बंद है यहाँ कौन आ सकता है चलो तुम्हारा आज शक़ दूर कर ही देता हूँ चलो ज़रा देखे इस ज़मीन के नीचे आखिर है कया।

माही – नही तुम कतई मत जाना उसके अंदर मुझे डर लग रहा है।

हफ़ीज़ – माहि कुछ नहीं होगा चुप हो जाओ


हफ़ीज़ ने किसी तरह माहि को समझा भुजाके आराम करवाया… हफ़ीज़ की निगाह जब उस कागज़ पे पड़ी तो उसे हैरानी हुई वह कागज़ जो खराब हो गया था ना जाने कहाँ ग़ायब हो गया था… हफ़ीज़ को कुछ समझ न आ सका…हफ़ीज़ ने मार्क को सक्त हिदायत दी की वह एक भी शब्द भूत का माहि के सामने नहीं कहेगा… लेकिन राज़ को खुलते देर नहीं लगती, धीरे धीरे माहि की हालात बिगड़ने लगी वह धीरे धीरे कमज़ोर होने लगी। दिन पे दिन उसका खून सूखने लगा…कभी सपने में बढ़बढ़ाके चीख उठी हफ़ीज़ इस बात से परेशान था माहि साफ़ कहती थी की कुछ काले लीबाज़ में।।

पढ़ना जारी रखें

Post a comment

0 Comments