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Horror Story in Hindi Part 4

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Horror Story In Hindi Part 4

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माहि ने धीरे धीरे मोमबती की रौशनी में सिडियो से निचे उलटे झाँके देखा… कोई नही आवाज़ भी बंद सी हो गई एकदम से जैसे माहि ने मुड़ कर देखा माहि का पूरा जिस्म जैसे काँप सा गाया…। अन्धेरे में कोई शख्स खड्डा था…सिडियो के ठीक बीचो बीच उसे देखके ही लग रहा था की वह शक्स की निगाहें सीधे माहि पे ही थी वह एकटक अँधेरे में ही माहि को घूर रहा…माहि धीरे धीरे कांपते हुए निचे आने लगी मोमबती की रौशनी में ही उस साये की और देखने लगी पर ये साया ग़ायब नहीं हो रहा था बल्कि रौशनी में दिखाई देने लगा…। महि थर्र थर्र काँपने लगी हथेली में राखी मोमबत्ती की लुआउ फाधपढाने लगी किसी भी पल माहि चीख़ने वाली थी


लेकिन अचनक उस काली साये पे नज़र पढ़के जब रौशनी से देखा तो माहि एक पल के लिए ठंडी सांस खींचते हुए खुद पे हसने लगी…। महराजा की मूर्ती ये वही महाराजा था जो इस राज महल का खुनी शैतान का पुजारी था…माहि ने उस मूर्ती की और देखा कद में करीब लम्बा एकदम दिवार के किनारें खड़ा था उसके पोशाख देखके ही लग रहा था की ये महाराज ही है…माहि मुस्कुराके सिडियो से निचे उतरते हुए कमरे की तरफ चली गई एक पल के लिए माहि को ऐसा लगा ऐसे कोई उसे घुर्र रहा हो।


माही ने जैसे पीछे मुड़के देखा तो अँधेरा और पास रखी महाराजा की मूर्ती के अलावा कुछ नहीं था… माहि चुपचाप मुस्कुराके आगे बढ़ गयी उसे मन का वेहम लगा। अचानक उस मूर्ती का सर एक पल के लिए करर करर आवाज़ करता हुआ दाये और मूढ़ गया…मानो जैसे माहि को जाते हुए वह देख रहा था…।


हफ़ीज़ कमरे में चुपचाप शाही चेयर पे बैठा सिगरेट को लिघ्टर से जलाये धुँआ छोड़ रहा था…। अचानक माहि को कमरे में मजूद देख एक पल के लिए हफ़ीज़ उठके बरामदे की और चला गया बहार हो हो करती हवा से हफ़ीज़ सिहर उठा लेकिन माहि को दुःख में देख वह उसे नज़रें नहीं मिला पा रहा था… सिगरेट का कश लेता हुआ बार बार लाइटर को जलाते भुजते हुए हफ़ीज़ से अब चुप रहा न गया उसने धीरे से सिगरेट को हवा में फेंका। और दरवाजा लगता हुआ अंदर आया।


हफ़ीज़ – I am sorry mahi मुझे उस वक़्त तुमसे ऐसे बात नहीं करना चाहिए था

माही – नही तुम्हें मांफी नहीं मांगनी चाहिए गलती मेरी ही मैंने तुम्हें बेमतलब में फाॅर्स किया की तुम यकीन न करते हो पर मेरे लिए ये पहन तो सकते हो।

हफ़ीज़ – माहि मैं तुम्हें कैसे समझाऊ की मैने खैर ठीक है 


हफ़ीज़ ने उस लॉकेट को हाथ में लेके उसे एक बार देखा…माहि मुस्कुराकए एकदम से हफ़ीज़ के गले लग गायी।।मैं बहुत खुश हूं…। महि ने मुस्कुराके हफ़ीज़ के कान में कहा…”मै भी जान”…। हफ़ीज़ ने माहि को खुद पे प्यार करता हुआ देख मुस्कराया


माही – मैं निचे जा रही हूँ तुम आ जाना खाना ठण्डा हो जाएगा

हफ़ीज़ – हाँ वैसे भी यहाँ अँधेरा जल्दी हो जाता है  जल्दी खा पी लो फिर काम भी शरू करना है मुझे अकेले तुम जाओ मैं आता हो।

माही – ओके…। कहते हुए माहि नीचे चली गयी


हफ़ीज़ बिस्मिल्लाह के लॉकेट को देखते हुए अफ़सोस सा मुंह बना कर उसे दराज़ में रखके कमरे से बहार चला गया… उसने सिर्फ माहि का दिल रखने के लिए ये बात कहीं थी। जलद ही टेबल पे बैठके माहि और हफ़ीज़ ने एक दूसरे की और मुस्कुराया… माहि हफ़ीज़ के गले में गौर करने लगी लेकिन उसे हफ़ीज़ के निघटसुइट पहने गले के पास कुछ नहीं दिखा…। महि जल्द ही चुप होके खाना खाने लगी…लेकिन फिर उसके चेहरे पे मुस्कान आयी जब हफ़ीज़ के गले पे एक चमकदार लॉकेट को देखा हफ़ीज़ ने बात का मान रख लिया था।


हो हो करते सियार के रोने से माहि कुछ पल के लिए खाना छोड़कर बहार की और देखने लगी… झींगुर की आवाज़ पुरे महल में एकदम अँधेरा और सन्नाटा… हफ़ीज़ ने दूसरा निवाला लिया ही था की माहि को गम्भीर देखके मुस्कुराया “माहि खाना ठण्डा हो जाएगा क्या देख रही हो अँधेरे में”


“तुमने वह आवाज़ें सुनी”… महि ने मुस्कुराके बोल

“हाहाहा जंगल है गाढ़ी घोड़े की आवाज़ थोड़ी न आएगी यहाँ बहुत से जंगली जानवर है काम खत्म होने दो फिर थोड़ा वहां भी घूमेंगे”…। हफ़ीज़ ने मुस्कुराके बोल

“नहीं नही मैं घर में ठीक हूँ”…। इतना केह्के माहि और हफ़ीज़ दोनों मुस्कुराने लगे


चांद एकदम साफ़ दिख रहा था…महल पूरा सन्नाटे में हुआ था… माहि ने एक बार हफ़ीज़ की और देखा जो चादर ओढ़े आँखें बन्द किये सोया हुआ था… माहि चुपचाप बहार की और देखने लगी खिड़की से बहार चारो और बेहद सन्नाटा बस रह रह के जंगल से जानवरों की आवाज़ें आ रही थी कभी हवा से हिलते पेड के टहनियों की आवाज़ इस सर्द रात में नींद आँखों में नहीं थी माहि के…महि घड़ी की और देखने लगी टिक टोक टिक टोक… पूरा महल एकदम शांत और अंधेरे में बस नीचे के लिविंग एरिया में दो मोमबत्ती मेज़ पे जल रही थी और ऊपर के माहि और हफ़ीज़ के कमरे में एक बड़ी सी मोमबत्ती जिसकी रौशनी से पूरा कमरा जग मगा रहा था।


कहाच खछ खछ…माहि को अजीब सी आवाज़ सुनाई दी…उसने उठके एक बार चारो और देखा फिर खिड़की से बहार झांका।।खच खछ खछ।।मानो जैसे कोई ज़मीन कोढ़ रहा हो…माहि गौर से बहार देखने लगी चारो और गहरा सन्नाटा छाया हुआ था…माहि ने एक बार हफ़ीज़ को जागना चाहा।।लकिन वह गहरी नींद में सोया हुआ था…बिना देरी किये माहि ने मोमबती उठायी और दरवाजे से बहार निकली…चर्र चुर्र करता हुआ दरवाजे की आवाज़ निकळी।।महि ने एकबार बहार झाँका चारो और घाना अँधेरा उन भयानक तस्वीरो को देख माहि थोड़ी सहम उठी अँधेरे भी कितने डरावने से लगते है ना जाने कैसे शौक थे इस महाराजा के लेकिन माहि राज़ से अब भी बेख़बर थी


माही ने सामने की और देखा दो मोमबत्तिया जल रही थी…माहि धीरे धीरे सिडियो से निचे उतरने लगी…।नीचे उतरने के बाद उसने एक बार चारो और देखा गहरा सन्नाटा छाया हुआ था…कोई भी नहीं था…अचानकक हवा का झोंका जिस्म को छूते ही माहि सिहर उठके ूस अँधेरे भरे कमरे की और देखने लगी…।ठाढ ठढ।।महि धीरे धीरे आगे जाने लगीई और धीरे धीरे…कोई आवाज़ आ रही थीई मोमबत्ती हाथ में


माही एक बड़े घर की बेटी होने के साथ साथ अपनी तालीम में भी आगे थी।।उसने ढेरे ढेरे कलमा पढ़ना शुरू कर दिया।।उसके दिल की देशात बढ़ने लगी वह ूस अँधेरे वाले कमरे के ठीक पास ाकर खरी हुयी उसने एक बार काँपते हुए मोम्बत्तीय से देखहा उसे ठण्डी हवा मेहसूस हुयी उसका बदन सिहर उठा उसने हिम्मत जुटाते हुए तीन सीडी उतारते ही ोूसने धीरे से जैसे दरवाजा खोळ


चर चररर करता हुआ दरवाज़ा एक तीखी आवाज़ के साथ खुल गया…। महि धीरे धीरे कमरे के अंदर रौशनी से देखने लगी अंदर भी बहार की तरह तसवीरें टूटे लैंप हर तरफ धुल और मिट्टी खण्डार जैसी हालत थी…महि को वह आवाज़ फिर सुनाई दी इस बार ये आवाज़ एकदम ठीक साफ़ सुनाइ दी और बेहद नज़दीक माहि ने जैसे ही दायीं और देखा हलकी रौशनी आ रही थी महि ने मोमबत्ती से जब थोड़ा पास जा के देखा तो खिड़की थी टुटी खिड़की जो खुल रही थी बंद हो रही थी हवा से… माहि ने जैसे ही खिड़की को कस्स के लगाया तो खिड़की टकराना बंद हो गयी अभी माहि दो कदम ही पीछे हटी थी की ठाढ़ ठाढ़ से वह काँप सी गयी उसने एक बार ज़मीन की और मोमबती दिखाई

रौशनी में उसे दिखा की ये ज़मीन नहीं थी ये एक खोकला दरवाजा जैसा कुछ था… जल्द ही रौशनी में उस काले लोहे के दरवाजे के इधर उधर उसे ज़ंजीर दिखायी दी जिसपे मोटा ताला लगा हुआ था। महि एक पल के भी वहां न ठहरी और सीधे दौड़ते हुए उस कमरे से बहार आयी…और फिर सिडियो से अपने कमरे पे कमरे पे आके उसने लगभग गहरी सांस ली जिस्म पसीना पसीना हो गया था… उसने जो कुछ देर पहले देखा उसे यकीन नहीं हो रहा था फ़र्श पे बना एक लोहे का दरवाजा जिसे सक्त इसे ज़ंजीर से बंद किया गया था… माहि ये बात हफ़ीज़ को बताना चाहती थी लेकिन वह इतनी सहम गयी थी की उस रात उसने हफ़ीज़ को बिना कुछ बताये चादर ओढ़के सोना मुनासिब समझा


टिक टिक टिक।। घड़ी की सूई २ बजे हो गयी माहि चुपचाप आँखे खोले बस लेटी उस कमरे को याद कर रही थी… महि को इस महल में नींद नहीं आ रही थी उसने काफी करवट बदली। लेकिन नींद कहाँ? उसका दिल किया एक बार हफ़ीज़ को सब सच्चाई बता दे लेकिन क्या बताना ठीक रहेगा? उस रहस्य को जाने बगैर माहि की नींद जैसे उड़ गयी थी। चानक थक थक थक करती घोड़ों की आवाज़…माहि एकदम से चौंक उठ गयी।


उसने चारो और देखा फिर उसने एक पल में ही चादर हटा कर फिर खिड़की से बहार झाँका। यह आवाज़ बहार से आ रही थी घोड़ों के कदमो की आवाज़ जैसे मानो दौड़ते हुए कहीं से आ रही थी और भी पास आते ही आवाज़ एकदम साफ़ सुनाइ दे रही थी इसका मतलब क्या इन जंगलों में घोड़े? ये बात कुछ हज़म नहीं हुयी हफ़ीज़ खुद कहा था आस पास जंगली जानवार और वयवन जंगल के अलावा कुछ भी नहीं है माहि ने जैसे ही खिड़की से महल के पिछवाडे की और झाँका तो उसका पूरा जिस्म जैसे बरफ की तरह ठण्डा होगया माहि ने देखा


ठक ठक करते हुए कुछ घोड़ों पे बैठे लोग महल के ठीक पास आके खड़े हो गए। और सब के सब काले लीबाज़ में बस उनकी निगाहों को माहि देख सकती थी उनकी आंखों देखकर ही साफ़ लग रहा था कितने कठोर माहि चुपचाप चुप चुप के उन लोगोको देख रही थी वह लोग एक एक करके घोड़े से उतरे…और फिर धीरे धीरे राज महल की और आने लगे माहि का पूरा जिस्म काँपने लगा ए। ई कैसी जैसे राजा राजवाडे के सैनिक बिलकुल ठीक वैसी पोषक सब बड़ी बड़ी जूतो की कदमो के साथ महल के तरफ आने लगे…। महि ने जल्द ही दौड़ते हुए हफ़ीज़ को एक झटके में झिंजोड़के उठाया


माही : हाफ्फीज़्ज़्ज़्ज़ ओ।।हहहह उठो।व हफ़ीज़ज़ज़ उठो

हफ़ीज़ : उफ़ क्या हुआ इतनी रात गए क्यों उठा रही हो प्लस सोने दो

माही : नही पलिस एक बार उठो कुछः लोग घोड़े पर से उतरके महल के अंदर आ रहे है मुझे डर लग रहा  प्लस उठू ना

हफ़ीज़ : उफ्फ रुको एक मिनट क्या हुआ


हफ़ीज़ ने उठते ही जब भाउक्लायी डरी शमी माहि की और देखा तोह एक पल के लिए वह भी गम्भीर भाव से उठ बैठा। "अरे हुआ क्या?”… "मैने कुछ लोगो को अपने महल के करीब आते देखा”…। "अरे कौन लोग बता तो सही”……माहि ने बिना कुछ कहें बाज़ू पकड़े हफ़ीज़ को बहार की और देखने को बोलै…हफीज़ ने जैसे बाहर की और देखा ना कोई भी नही यहाँ किसी घोड़े की शब्दो का आवाज़ भी नाहि


हफ़ीज़ एकदम से दौड़ा…। उसने दरवाजा खोला महि चिल्लायी नही प्लीज् नीचे मत उतरो दरवाजा मत खोलो वहः बहुत सारे है। लकिन हफ़ीज़ कहाँ सुनने वाला था? हाथ में एक टोर्च जल्द ही दरवाजे से बहार निकले जैसे ही ठण्ड और कोहरे में चारो और देखा तो एक गहरा सन्नाटा…हफीज़ दौढ़ता हुआ महल की दूसरी और देखने लगा

माही भी दौड़ते हुए हफ़ीज़ के पास गयी। हफ़ीज़ ने माहि की और लगभग डाँटते हुए बोल

“क्या माहि देखो दूर दुर्र तक भी कोई नहीं तुमने कहाँ घोड़ा ? कहाँ है  घोड़ा? अरे यहाँ तो घोड़ों के पाँव के निशान भी नही कौन लोग थे अब कुछ बताओ भी?”… हफ़ीज़ ने माहि की और देखा

“ मैँने देखा था…वहां पे बड़े बड़े घोड़ों पे सवार कुछ सैनिक जैसे काले लीबाज़ इधर ही कहरे हुए और पता नहीं कहाँ सब ग़ायब हो गए?”……महि ने एक पल के लिए अपने मुंह पे हाथ 

हफ़ीज़ – देख।। देखो माहि देखो शायद तुम्हारा वहम होगा उठ इतने दूर जगह में कौन आएगा ये हिंदुस्तान तो नहीं जहाँ मैं कहुं की डकैत आएगा हहाहा

माही : तो वो अरे मैनेँ खुद इन्ही आँखों से देखा बड़े काले लीबाज़ में कुछ घोड़े पे इधर उतरे और लगभग इस महल के अंदर आने की कोशिश

हफ़ीज़ – देखो माहि रात बहुत हो चुकी है तुमने मेरी नींद भी ख़राब कर दी अब और क्या चाहिए चलो चलो अंदर तुमने ज़रूर कोई सपना देखा होगा ज़रा नीचे देखो अरे देखो तो सही कोई पाँव का निशाँ देखो हमारे पाँव के निशाँ के अलावा यहाँ कोई घोड़ा आदमी किसी का पाँव का निशान है ही नही तो फिर तुम कैसे कह सकती हो?

माही : यकीन मानो मैंने देखा था

हफ़ीज़ – चलो कोई नहीं कोई नही चलो


हफ़ीज़ माहि को पकड़े वापिस महल के अंदर ले आया और फिर कमरे में…"हो सकता है तुमने बुरा सपना देखा होगा वैसे भी नया जगह है थोढ़ा नयापन लगेगा ही धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा और हम यहाँ बस सिक्स मोनथस रहेंगे और उसके बाद फिर मेरा काम खत्म ये जगह तोड़के अच्छा रिसोर्ट बनेगा फिर आके तुम यहाँ से जान नही चाओगी हाहाहा”…।हफ़ीज़ माहि का दिल बेहलाता हुआ उसके पसीने को पोंछ उसे साधार ओढा चुका था।


माही डरी सेहमी पूरी रात हफ़ीज़ से लिपटी सोई रही लेकिन नींद कहाँ वह बस आँखें मुंडे थी उसने सपना नहीं हकीकत देखा था…महि ये तक हफ़ीज़ को बता भूल गयी की उसने निचे के कमरे में एक गुप्त दरवाजा देखा था…पर डर से उसने कुछ उस रात बताया नही और जल्द ही दोनों सो गए


सूबह की किरण हवेली पे पड़ी नौकर हफ़ीज़ के कप में चाय डाल रहा था… माहि गुमसुम बैठी थी, हफ़ीज़ चश्मे को ठीक करे अखबार पढ़ रहा था। अचानक उसकी नज़र माहि पे पड़ी। महि गुमसुम चुपचाप बैठि हुयी थी कल रात के वाक़ये से मुस्कान उसके चेहरे से जैसे मिट गयी थी।

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